शुक्रवार, 5 मार्च 2010

"ब्लैकहोल!"

दीखता है यहाँ सब, पर एक रंग में
पूरा भी है यहाँ सब, पर एक रंग में
कहने कों सब काला कहते
हर ज़िन्दगी हुई है कैद इस रंग में
अब भी है. आगे भी हो होंगी
जाएँगी सब इस छेद में
समझा कोई,
कोई समझा नहीं
बस उलझता ही चला गया
हर कोई.
इस "ब्लैकहोल" में  
जल्द आ रहा है ये "ब्लैकहोल!" आपकी कहानी ले कर.

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