बुधवार, 16 जून 2010
jhak-jhaki
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लीजिये मेरी ताज़ा-ताज़ा झकझकी
स: भीगी हुई तिल्ली है हुं माचिस की, मुझे डिब्बी में ही रहने दो वरना बर७ आने वाली है, हुं फिश हो जायेंगे फिर फुदखते रहेंगे, अच्छा लगेगा का, हाँ नहीं बोलो लगेगा का अच्छा, नहीं न फिर तो रहने दो न हमको डिबिया में.
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
"ब्लैकहोल!"
पूरा भी है यहाँ सब, पर एक रंग में
कहने कों सब काला कहते
हर ज़िन्दगी हुई है कैद इस रंग में
अब भी है. आगे भी हो होंगी
जाएँगी सब इस छेद में
समझा कोई,
कोई समझा नहीं
बस उलझता ही चला गया
हर कोई.
इस "ब्लैकहोल" में
जल्द आ रहा है ये "ब्लैकहोल!" आपकी कहानी ले कर.
सोमवार, 25 जनवरी 2010
love day
हुस्न वालों की रात है आज
दिलवालों की बात है आज
हम तो है पत्थर दिल, हमारी क्या औकात है आज
कहाँ फसा रहे हो हमे हुस्न वालों के झमेलों में
हम तो फसे है, पहले से गुर्वातों के मेलों में
शादी करलो
किसी ने मुझसे कहा "यार शादी करलो अब"
"अम्मा कहा फस रहे हो हम, हम इन सब चीजों से उपर की वस्तु है"
- वैसे भी हमरे अब्बा हुजुर कहा करते थे
"मिया निकहा वही करना जहा देने के लिए म्हेर की जरुरत न हो, और घर वही बसना जहा कोई गाऊ शहर न हो"
"तो अब तक कोई ऐसी जगहे ही नहीं मिली जहा कोई गाऊ शहर न हो, ऐसी कोई लड़की भी तो नहीं मिली जिसको मेहर की जरुरत ही न हो"
बुधवार, 20 जनवरी 2010
झकझकी
लाइन मार मुझको पटाले
मार दे तू आँख मुझको
ज़िन्दगी रोशन बना दे
हो गयी है,कट्टम-कुट्टी
तबियत क्यों है,संटी-संटी
थोड़ी सी बिंदास बनाले
मेरी .......
आँख मरोगी तो मर जायेंगे हम
लाइन मरोगी तो पात जायेंगे हम
गर ऐसे ही करती रही
तो सच कहते है कसम से
जिंदिगी भर के लिए तुमरे "जानेमन" हो के रह जायेंगे हम
स. लक्ष्मी कौन है?
अ. वो भगवन बिष्णु की बीवी है
स. और फिर भी उसने अपनी बीवी कों दुनिया भर के लोग-लुगाइयों में बाँट राखी है.
अब बिविओं कों पलना सब के बस की बात थोड़े ही है, फिर भी दुनिया दुसरो की बीवी के पीछे पागल है!
सोमवार, 18 जनवरी 2010
कान्हा
ऐसी धुन,ऐसी राग,छेड़ दो कान्हा तुम आज
बदलने लगे हवा छाने लगे ख़ुशी
गाने लगे मन मल्हार।
सदियों की है तपस्या ये मेरी,ऐसे नहीं कुछ माँगा है तुमसे
चाहा है जो भी वो ज्यादा तो नहीं है
दे दो कन्हैया मुझको ये वादा तो नहीं है
टूट जाए पल में ये भरम भी नहीं है
छुट जाये छन में अपना रिश्ता वो नहीं है
निस दिन आते हो मुझको जागते हो
बहियाँ छुरा के फिर कहा खो जाते हो
कब से खड़ा हूँ,द्वारे पे तेरे
मान जाओ अब कान्हा तुम मेरे
ऐसी धुन......
सरताज
भेज रहा हूँ अल्फाज अपने आपके दरबारे हुजुर
मिल जाये नजरे इनायत " नवी" आपके गुलाम कों
मैं अकेला नहीं जी रहा हूँ,दोजक से इस जहाँ कों
बना दो पल में हीरा तुम,मिट्टी के इन्शान कों
यु ही सब कहते नहीं है, जहाँ के हो "खुदाया" तुम
मुल्के अरब में रहते हो। बसते हो हर मन में तुम
दिल के,मन की, चिलमन की क्या
सुन लेते हो ख़ामोशी कों भी तुम
तुम बिन सब अधुरा सा है
कर दो जहाँ मुक्कमल तुम
आने से पहले क़यामत,होने से पहले ये दुनिया जहनुम
दोजक की आग है "अल्लाह"
बन्दों की फरयाद कों "मौला"
करो न ऐसे नजरे अंदाज तुम
उम्मीद की अर्ज है तुमसे,करदो चिरागे रोशन तुम
नादा हूँ मैं,नादा है मन
दौलत हो इस तन की तुम
नापाक नहीं इरादे मेरे सरताज हो तुम
रविवार, 17 जनवरी 2010
ना-के-लायक
नहीं है हम काबिल किसी, किसी और के संग मौज करो
हो बेहतर ज्यादा वो हमसे,तुम दुआए रोज़ करो
लात मारो इस "गधे" कों,उस संग प्यार करो
ना-के-लायक है ये तो,इस "नालायक" का त्याग करो
माटी में मिले ये "माटी मिला"
ऐसा कुछ तो सराफ दो।
जाए नरक में "कमबख्त/कमीना" तुम इतना तो प्रे करो
