सोमवार, 18 जनवरी 2010

सरताज

भेज रहा हूँ अल्फाज अपने आपके दरबारे हुजुर

मिल जाये नजरे इनायत " नवी" आपके गुलाम कों

मैं अकेला नहीं जी रहा हूँ,दोजक से इस जहाँ कों

बना दो पल में हीरा तुम,मिट्टी के इन्शान कों

यु ही सब कहते नहीं है, जहाँ के हो "खुदाया" तुम

मुल्के अरब में रहते हो। बसते हो हर मन में तुम

दिल के,मन की, चिलमन की क्या

सुन लेते हो ख़ामोशी कों भी तुम

तुम बिन सब अधुरा सा है

कर दो जहाँ मुक्कमल तुम

आने से पहले क़यामत,होने से पहले ये दुनिया जहनुम

दोजक की आग है "अल्लाह"

बन्दों की फरयाद कों "मौला"

करो न ऐसे नजरे अंदाज तुम

उम्मीद की अर्ज है तुमसे,करदो चिरागे रोशन तुम

नादा हूँ मैं,नादा है मन

दौलत हो इस तन की तुम

नापाक नहीं इरादे मेरे सरताज हो तुम

कोई टिप्पणी नहीं: